SC/ST पीड़ित होने भर से FIR का आदेश जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति (SC/ST) वर्ग से है, अदालत को स्वतः ही एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि प्रत्येक मामले में आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण करना आवश्यक है, उसके बाद ही यह तय किया जा सकता है कि एफआईआर दर्ज की जाए या शिकायत को अन्य तरीके से आगे बढ़ाया जाए।
यह मामला आजमगढ़ की एक विशेष अदालत से जुड़े आदेश को चुनौती देने से संबंधित था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसके साथ उत्पीड़न हुआ है और इस आधार पर पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने की मांग की गई थी। हालांकि निचली अदालत ने सीधे एफआईआर दर्ज कराने के बजाय पहले मामले की जांच और तथ्यों के परीक्षण का निर्णय लिया था।
इस आदेश को चुनौती देते हुए मामला हाई कोर्ट पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि न्यायालय किसी भी आवेदन पर बिना विचार किए केवल औपचारिक तरीके से आदेश नहीं दे सकता। अदालत का दायित्व है कि वह मामले के तथ्यों का अध्ययन करे और यह देखे कि क्या आरोपों में प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अदालतें “डाकघर” की तरह काम नहीं कर सकतीं, जहां केवल आवेदन मिलने पर बिना जांच-पड़ताल के एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया जाए। अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि शिकायत में प्रथम दृष्टया अपराध के पर्याप्त आधार मिलते हैं तो एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दिया जा सकता है, लेकिन हर मामले में यह स्वतः लागू नहीं होगा। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने अपील को खारिज कर दिया और निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।
यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखने और मामलों के उचित परीक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।




